
📜 मैसूर में सोमवार की एक सुनहरी, खिली हुई सुबह (वर्ष 2025)। हवा में ताजी फिल्टर कॉफी और चमेली के फूलों की महक तैर रही है और अज्जी काव्या और देव को लेकर कुक्कराहाली झील की सैर के लिए सिटी बस स्टॉप पर पहुंचीं।
सोमवार की सुबह कुक्कराहाली झील जाते समय देव से पार्क का नया हेरिटेज बेंच टूट जाता है और वह ₹20 देकर मामला निपटाने की कोशिश करता है। इंजीनियर मंजूनाथ के साथ सीखें कि टैक्स से शहर की सड़कें व बसें कैसे बनती हैं और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा क्यों जरूरी है।

📜 मैसूर में सोमवार की एक सुनहरी, खिली हुई सुबह (वर्ष 2025)। हवा में ताजी फिल्टर कॉफी और चमेली के फूलों की महक तैर रही है और अज्जी काव्या और देव को लेकर कुक्कराहाली झील की सैर के लिए सिटी बस स्टॉप पर पहुंचीं।

📜 देव खुशी से मखमली सीट पर उछल पड़ा और पर्यावरण-अनुकूल आधुनिक इलेक्ट्रिक बस को हैरान होकर देखने लगा।
"अरे वाह! इस बस के अंदर तो देखो! इंजन की बिल्कुल आवाज नहीं, ठंडी-ठंडी एसी, मखमली नीली सीटें और चमकती हुई डिजिटल एलईडी स्क्रीन! ऐसा लगता है जैसे हम पहियों वाले स्पेसशिप में बैठे हों!"

📜 देव आगे की रेलिंग पर पहुंचा और बड़े कौतूहल से ड्राइवर बसप्पा और इलेक्ट्रॉनिक डैशबोर्ड को देखने लगा।
"ड्राइवर बसप्पा अंकल! क्या यह ₹1 करोड़ की आलीशान इलेक्ट्रिक बस आपने अपनी पॉकेट मनी से खरीदी है? आप तो पूरे कर्नाटक के सबसे अमीर ड्राइवर होंगे!"

📜 50 वर्षीय ड्राइवर बसप्पा ने हंसते हुए स्टीयरिंग घुमाया और सार्वजनिक संपत्ति की अनोखी बात समझाई।
"हाहाहा! देव बेटा, अगर मेरे पास ₹1 करोड़ होते तो मैं मैसूर पाक मिठाई का पहाड़ खरीद लेता! इस बस का कोई एक मालिक नहीं है। सरकार ने हम सभी 10 लाख नागरिकों के टैक्स के साझा पैसों से इसे खरीदा है!"

📜 10 वर्षीय काव्या ने अपनी पिछली बचत की सीख को याद करते हुए उत्सुकता से पूछा।
"बसप्पा अंकल, सरकार नागरिकों से ₹1 करोड़ कैसे जुटाती है? क्या शहर के बीच में लोहे की कोई विशाल गुल्लक रखी होती है जिसमें सब पैसे डालते हैं?"

📜 बस सोलर पैनल वाली आधुनिक स्ट्रीटलाइटों और खिले हुए फूलों वाली सड़क से सरपट आगे बढ़ी।
"खिड़की के बाहर देखो, काव्या! जब भी माता-पिता कमाते हैं, राशन खरीदते हैं या घर का टैक्स भरते हैं, उसका एक छोटा हिस्सा सरकारी खजाने में जाता है। उसी साझा धन से ये पक्की सड़कें, सोलर लाइटें और बसें बनती हैं!"

📜 इलेक्ट्रिक बस कुक्कराहाली झील के हेरिटेज बोटैनिकल पार्क के सुंदर प्रवेश द्वार पर रुकी। अज्जी, काव्या, देव और चिंटू सुबह की ठंडी छांव में उतरे।

📜 झील के पानी पर प्रवासी पेलिकन पक्षी तैर रहे थे और शहर के लोग सुबह की सैर का आनंद ले रहे थे।
"ताजी हवा में गहरी सांस लो बच्चों! कुक्कराहाली झील मैसूर का हरा-भरा गहना है। देखो यहां के रास्ते और फूलों के बगीचे कितने साफ और सुंदर हैं! यह नागरिक देखभाल का जीता-जागता उदाहरण है।"

📜 ऊर्जा से भरपूर देव ने दौड़ लगाई और बेंच के ऊपर से कलाबाजी दिखाते हुए जोरदार छलांग लगा दी!
"गुलमोहर के पेड़ के नीचे वह नया चमचमाता हेरिटेज सागौन का बेंच तो देखो! अब देखो मेरा जादुई "उड़ता गरुड़" कलाबाजी वाला सुपर जंप!"

📜 चटाक-कड़क! देव का लाल जूता सागौन की नक्काशीदार लकड़ी से टकराया! पॉलिश किया हुआ खूबसूरत हत्था टूटकर घास पर जा गिरा!
"देव: "अरे बाप रे—मेरा जूता कोने में उलझ गया! बचाओ!""

📜 देव डर के मारे दोनों गालों पर हाथ रखकर सन्न खड़ा रह गया, जबकि चिंटू पिल्ला चिंता से देव को देखने लगा।
"हे भगवान! नहीं नहीं नहीं! सुंदर हत्था दो टुकड़ों में टूट गया! अज्जी मुझे साल 2099 तक कमरे में बंद कर देंगी! चिंटू, मुझे ऐसे घूर कर मत देखो!"

📜 अज्जी कमर पर हाथ रखकर गुस्से और चिंता से आगे बढ़ीं, जबकि काव्या ने टूटे हुए लकड़ी के टुकड़े को उठाया।
"देव! यह तुमने क्या कर दिया?! यह हेरिटेज बेंच नगर निगम ने पिछले हफ्ते ही बुजुर्गों के आराम के लिए लगवाया था!"

📜 देव ने घबराकर जेब से ₹20 का नोट निकाला और माली को थमाने की कोशिश की, जैसे कोई दुकान का बिल चुका रहा हो।
"चिंता मत कीजिए अज्जी, मैं सब ठीक कर देता हूं! माली अंकल, यह ₹20 का नया नोट आप रख लीजिए! लकड़ी के पैसे पूरे हो गए, अब हमारा हिसाब बराबर, ठीक है ना?"

📜 सफेद हेलमेट, खाकी शर्ट और गोल चश्मे वाले 46 वर्षीय सिविल इंजीनियर मंजूनाथ नक्शों के साथ आगे आए।
"रुको नन्हे उस्ताद! उस ₹20 के नोट को जेब में वापस रखो। शहर की सार्वजनिक संपत्ति का हिसाब किसी दुकान की टूटी टॉफी की तरह ₹20 में चुकता नहीं होता।"

📜 मंजूनाथ ने प्यार से देव का हाथ रोका और पूरे पार्क की तरफ इशारा करते हुए सामूहिक स्वामित्व की बात समझाई।
"मैं मैसूर नगर निगम से इंजीनियर मंजूनाथ हूं। यह पार्क बेंच न तो इस माली का है, और न ही मेरा। यह मैसूर के सभी 10 लाख नागरिकों का साझा बेंच है!"
फिन-जूनियर (FinJunior) के इन इंटरैक्टिव खेलों और कहानियों को Zerodha की Rupee Tales और Varsity Junior पहल से प्रेरित होकर तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य भारत के हर बच्चे तक व्यावहारिक वित्तीय समझ पहुँचाना है।